विस्थापन का मुद्दा फिर गरमाया : बस्तर में चिड़ियाघर निर्माण का ग्रामीणों ने किया विरोध
admin Fri, Apr 18, 2025
बस्तर में प्रस्तावित चिड़ियाघर का ग्रामीणों ने किया विरोध, बोले – एक बार फिर बेदखली क्यों?
जगदलपुर: छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में प्रस्तावित चिड़ियाघर (अभ्यारण्य) को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश देखने को मिला। भानपुरी वन परिक्षेत्र में बसे सालेमेटा खड़गा, छुरावण्ड, जामगांव और कमेला पंचायत के सैकड़ों विस्थापित ग्रामीण गुरुवार को जगदलपुर जिला मुख्यालय पहुंचे। उनका आरोप है कि उन्हें पहले कोसारटेडा बांध के कारण विस्थापित किया गया था, और अब एक बार फिर उसी जमीन से बेदखल करने की योजना बनाई जा रही है।
कोसारटेडा बांध से हुए विस्थापन के बाद मिला था वन पट्टा
ग्रामीणों का कहना है कि 1980 में बने कोसारटेडा बांध के कारण उन्हें उनकी पुश्तैनी जमीनों से हटाकर दूसरी जगह बसाया गया था। इसके एवज में उन्हें वन अधिकार पट्टे के तहत भूमि दी गई, जिसे उन्होंने वर्षों की मेहनत से उपजाऊ बनाया और अब उससे उनकी आजीविका चल रही है।
चिड़ियाघर निर्माण के विरोध में सौंपा गया ज्ञापन
सैकड़ों ग्रामीणों ने बस्तर के अपर कलेक्टर सीपी बघेल को राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में उन्होंने मांग की कि चिड़ियाघर निर्माण के लिए किसी वैकल्पिक जगह का चयन किया जाए, जिससे उनकी वर्तमान जमीन और जीवनशैली प्रभावित न हो।
कांग्रेस नेताओं ने दिया समर्थन
इस प्रदर्शन में नारायणपुर के पूर्व विधायक चंदन कश्यप और कांग्रेस के ग्रामीण जिला अध्यक्ष प्रेम शंकर शुक्ला भी ग्रामीणों के साथ मौजूद रहे। चंदन कश्यप ने बताया कि करीब 940 परिवारों को बांध के चलते विस्थापित किया गया था। अब उन्हीं परिवारों को फिर से उनकी जमीन से हटाने की योजना बनाई जा रही है, जो पूरी तरह अनुचित है।
"ग्रामीण पिछले 45 वर्षों से इस जमीन पर खेती कर रहे हैं, अब उन्हें रोजगार के नाम पर फिर से बेदखल किया जा रहा है।"
– चंदन कश्यप, पूर्व विधायक
प्रेम शंकर शुक्ला ने कहा कि जिस क्षेत्र को चिड़ियाघर के लिए चुना गया है, वह बस्तर और कोंडागांव का बॉर्डर इलाका है और आसपास कई हेक्टेयर वन भूमि मौजूद है, लेकिन सरकार उन्हीं लोगों को निशाना बना रही है जिन्हें पहले ही विस्थापित किया जा चुका है।
वन विभाग का पक्ष: 250 हेक्टेयर में सर्वे जारी
भानपुरी वन परिक्षेत्र अधिकारी पीएल पांडेय ने बताया कि विभाग को चिड़ियाघर निर्माण के लिए सर्वे का निर्देश मिला है। प्रारंभिक चरण में 250 हेक्टेयर भूमि पर सर्वे किया जा रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह आंकड़ा आगे बढ़ या घट सकता है।
अपर कलेक्टर ने मांगी जानकारी
अपर कलेक्टर सीपी बघेल ने कहा कि उन्हें चिड़ियाघर परियोजना की जानकारी ग्रामीणों से ही मिली है और उन्होंने मामले की पूरी जांच कराने का आश्वासन दिया है।
निष्कर्ष:
बस्तर में प्रस्तावित चिड़ियाघर एक ओर पर्यटन को बढ़ावा देने का कदम हो सकता है, लेकिन दूसरी ओर यदि यह पहले से विस्थापित और वन अधिकार पट्टा धारकों की जमीन पर बनता है, तो यह सामाजिक न्याय और आदिवासी अधिकारों पर सवाल खड़ा करता है। अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन ग्रामीणों की इस मांग को कितनी गंभीरता से लेता है।
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