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ISRO की बड़ी कामयाबी : आदित्य-L1 ने खोले सूरज के छिपे रहस्य, वैज्ञानिकों को मिली अहम सफलता

Media Yodha Desk Sun, Jul 5, 2026

नई दिल्ली : भारत के पहले सूर्य मिशन 'आदित्य एल-1' ने  बड़ी सफलता हासिल की है. आदित्य एल-1 स्पेस क्राफ्ट हमारे सबसे करीबी तारों के रहस्यों को उजागर कर रहा है. 2024 में लैग्रेंजियन पॉइंट 1 (L1) पर काम करने के अपने पहले साल के दौरान, सूरज बहुत ज्यादा एक्टिव था और उसने कई जबरदस्त सोलर फ्लेयर इवेंट्स पैदा किए. खास L1 पॉइंट से आदित्य-L1 ने खास और अनोखी 'आयरन फ्लोरेसेंस' की घटना दर्ज की है.

क्या है आयरन फ्लोरेसेंस?

ISRO के अनुसार, जब कोई बड़ा सोलर फ्लेयर फूटता है, तो यह सूरज के ऊपरी वायुमंडल (कोरोना) को बहुत ज्यादा तापमान तक गर्म कर देता है, जिससे हाई-एनर्जी वाली X-रेज का जबरदस्त विस्फोट होता है. हालांकि इनमें से ज्यादातर X-रेज बाहर अंतरिक्ष में निकल जाती हैं, लेकिन कुछ नीचे की ओर जाती हैं और सूरज की ठंडी, घनी सतह की परत, जिसे फोटोस्फीयर कहते हैं के साथ इंटरैक्ट करती हैं. यहां वे बड़ी मात्रा में मौजूद न्यूट्रल आयरन एटम्स के साथ इंटरैक्ट करती हैं.

जब ये कोरोनल X-रेज न्यूट्रल आयरन एटम्स से टकराती हैं, तो आयरन एटम्स एनर्जी को सोख लेते हैं और 6.40 keV की एनर्जी पर अपनी खास X-रे चमक छोड़ते हैं. इस प्रोसेस को 'X-रे फ्लोरेसेंस' कहा जाता है. आदित्य-L1 पर लगा सोलर लो एनर्जी X-रे स्पेक्ट्रोमीटर (SoLEXS) फ्लेयर से निकलने वाली X-रेज और तेज फ्लेयर्स से फोटोस्फेरिक आयरन फ्लोरेसेंस का पता लगाने के लिए उपयुक्त है. SoLEXS इंस्ट्रूमेंट को ISRO के UR राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) में स्वदेशी रूप से विकसित किया गया है.

सोलर फ्लेयर को समझिए

‘सोलर फिजिक्स' मैगजीन में छपी स्टडी में कहा गया है कि आयरन फ्लोरेसेंस की देखी गई चमक काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि फ्लेयर सूरज की डिस्क यानी सतह पर कहां होता है. सूरज की डिस्क के सेंटर के पास होने वाले फ्लेयर्स एक मजबूत फ्लोरेसेंस सिग्नल दिखाते हैं, जबकि सूरज के किनारे (लिम्ब) के पास होने वाले फ्लेयर्स के लिए सिग्नल बहुत ज्यादा दबा हुआ था.

यह 'सेंटर-टू-लिम्ब' बदलाव थ्योरेटिकल मॉडल से मेल खाता है, यह एफिशिएंसी कैसे बदलती है, इसकी स्टडी करके, रिसर्चर अब आयरन फ्लोरेसेंस को एक संभावित डायग्नोस्टिक टूल के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं ताकि सोलर एटमॉस्फियर में ऊपर कोरोनल एक्स-रे सोर्स की ऊंचाई की जांच की जा सके और इन एक्सप्लोसिव घटनाओं की यूनिक व्यूइंग ज्योमेट्री की स्टडी की जा सके.

क्यों खास है आदित्य-L1 की यह खोज?

  • सूर्य को समझने में बड़ी मदद: 'आयरन फ्लोरोसेंस' से वैज्ञानिक यह पता लगा सकेंगे कि सोलर फ्लेयर के दौरान सूर्य का बाहरी वातावरण यानी कोरोना में एक्स-रे किस तरह पैदा और फैलते हैं.

  • सौर तूफानों की स्टडी: इससे सोलर फ्लोरेसेंस की ऊंचाई, संरचना और ज्योमेट्री की स्टडी पहले से ज्यादा सटीक तरीके से की जा सकेगा.

  • स्पेस वेदर की भविष्यवाणी: सौर तूफान सैटेलाइट, GPS, कम्युनिकेशन सिस्टम और पावर ग्रिड पर असर डाल सकते हैं. इस तरह की स्टडी भविष्य में स्पेस वेदर मॉनिटरिंग को बेहतर बना सकते हैं.

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