🌿 सरहुल पर्व 2025 : धरती और प्रकृति के नवजीवन का उत्सव
सरहुल पर्व की सबसे सुंदर परंपरा है धरती और सूर्य के विवाह की कल्पना।
उरांव समाज मानता है कि इस दिन धरती और सूर्य का मिलन होता है, जिससे जीवन की शुरुआत और फसल की उपज का मार्ग प्रशस्त होता है।
"हम प्रकृति पूजक हैं, सरना स्थापना कर सरहुल मनाते हैं। प्रकृति जब नया रूप लेती है, हम उसे नववर्ष की तरह मनाते हैं।"
— शंकर दयाल उरांव, जशपुरवासी
💃 धुन, नृत्य और सामूहिक आस्था का पर्व
सरहुल पर्व में महिलाएं, पुरुष और युवा पारंपरिक वेशभूषा में सजकर गांव के सरना स्थल पर एकत्र होते हैं।
मांदर की थाप, गीतों और नृत्य के माध्यम से प्रकृति को धन्यवाद देते हैं। ये पूजा पारंपरिक पेड़ों, फूलों, जल और अन्न को धरती मां को अर्पित कर की जाती है।
"धरती मां हमारी जननी हैं। हम उन्हें नई ऋतु में सजती देख पूजा करते हैं। ये हमारे पूर्वजों की परंपरा है।"
— धनकुमारी, स्थानीय महिला
🌍 सरहुल का सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व
नया साल: उरांव जनजाति सरहुल को नववर्ष की शुरुआत मानती है।
प्रकृति से जुड़ाव: यह पर्व सस्टेनेबिलिटी और पर्यावरण संरक्षण का जीता-जागता उदाहरण है।
सामूहिकता: सरहुल समाज को जोड़ता है, पुरखों की याद दिलाता है और पीढ़ियों को संस्कृति से जोड़ता है।
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