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बस्तर (छत्तीसगढ़) : 600 साल पुरानी परंपरा, आस्था और संस्कृति का संगम: बस्तर में धूमधाम से मनाया गया श्री गोंचा महापर्व 2025

admin Sat, Jun 28, 2025

छत्तीसगढ़ का बस्तर क्षेत्र न केवल अपनी प्राकृतिक खूबसूरती बल्कि अनोखी परंपराओं और गहन संस्कृति के लिए भी पूरे देश में विख्यात है। दशहरे के बाद बस्तर का दूसरा सबसे लंबा और भव्य पर्व — श्री गोंचा महापर्व — पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ 27 दिनों तक मनाया जाता है। इस वर्ष भी बस्तर की पावन धरती पर 600 वर्षों से चली आ रही इस अद्भुत परंपरा को बड़ी श्रद्धा और गरिमा के साथ मनाया गया।


🎉 क्या है श्री गोंचा पर्व?

गोंचा पर्व बस्तर की रियासतकालीन परंपरा है, जिसकी शुरुआत भगवान श्रीजगन्नाथ की पूजा से होती है। ठीक पुरी की रथयात्रा की तरह ही बस्तर में भी भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के तीन विशाल रथ निकाले जाते हैं। ये रथ बस्तर की राजधानी जगदलपुर में नगर भ्रमण करते हैं, और जनकपुरी स्थित मौसी के घर तक पहुंचाए जाते हैं।


👑 राजपरिवार निभाता है अहम भूमिका

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने बताया कि गोंचा पर्व की परंपरा बस्तर में राजा पुरुषोत्तम देव के समय से चली आ रही है। जैसे पुरी में गजपति महाराज "छेरा पोहरा" (सोने के झाड़ू से झाड़ू लगाना) करते हैं, ठीक उसी प्रकार बस्तर में भी रथयात्रा के दौरान राजपरिवार झाड़ू लगाकर प्रभु के प्रति समर्पण दिखाता है।


🔫 बांस की तुपकी से अनोखी सलामी

इस पर्व की एक अनोखी परंपरा में, बांस की बनी 'तुपकी' (बांस की तोप) में मलकांगिनी के फलों को भरकर एक-दूसरे पर निशाना साधा जाता है। यह एक प्रकार की सांकेतिक युद्धक्रीड़ा है, जिसे शुभ संकेत माना जाता है। साथ ही तीनों रथों को पारंपरिक 'पेंग' और 'तुपकी' से सलामी दी जाती है।


🛕 जनकपुरी में होती है महाआरती

अरण्यक ब्राह्मण समाज की सदस्य दीप्ति पांडेय ने बताया कि रथयात्रा के दौरान प्राचीन मूर्तियों को रथ में विराजित कर उन्हें मौसी के घर — जनकपुरी (सिरहासार भवन) — ले जाया जाता है। वहां "बाहूड़ा गोंचा" के दिन महाआरती होती है और प्रभु की पुनः वापसी होती है।


🌍 देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु और पर्यटक

इस ऐतिहासिक पर्व को देखने के लिए न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि देश के अन्य राज्यों और विदेशों से भी पर्यटक बस्तर आते हैं। बस्तर की 360 अरण्यक ब्राह्मण पंचायतें, आदिवासी समाज, मांझी-चालकी समाज और हजारों की संख्या में श्रद्धालु मिलकर इस आयोजन को एक भव्य सांस्कृतिक उत्सव में बदल देते हैं।

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